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Tuesday, April 13, 2010

चापलूसी की महिमा


चंद दिन पहले हमारे पड़ोसी मिश्रा जी के घर इलाके के एक बहुत बड़े नेता आ पहुंचे। मिश्रा जी का सारा परिवार उनकी सेवा में जुट गया। मेहमान नवाजी की रस्म निभाते हुए मिश्रा जी ने अपने नौकर से झटपट चाय-नाश्ता तैयार करने को कहा। नेता जी ने कहा कि आजकल चाय मुझे माफिक नही आती आप चाय तो रहने ही दो। मिश्रा जी के नौकर ने भी कहा कि आप बिल्कुल ठीक कह रहे हो। चाय का पीना भी क्या पीना? न कोई इसकी शक्ल, न कोई सीरत और सूरत, देखने में बिल्कुल काली कलवटी। एक बार आदमी चाय पी ले, सारी रात नींद ही नही आती। सबसे खराब बात तो यह है कि जिस किसी कपड़े पर चाय का थोड़ा सा भी दाग लग जाये वो सारी उंम्र नही उतरता।
इससे पहले की नेता जी कुछ और कहते उनका नौकर बोला कि मैं आपके लिए बहुत ही षानदार और बढ़िया मीठी लस्सी बना कर लाता  हूँ। लस्सी जैसी कोई दूसरी चीज तो इस दुनियां में हो ही नही सकती। भगवान ने लस्सी को क्या बढ़िया रंग-रूप दिया है। जब दूध-दही से लस्सी तैयार होती है, तो सारे घर में नाच गाने जैसा महौल बन जाता है। लस्सी पीते ही जहां मन को षंति मिलती है, वही इससे सेहत भी ठीक बनी रहती है। नौकर की बात को बीच में काटते हुए नेता जी ने कहा नही भाई लस्सी तो तुम रहने ही दो, क्योंकि इसे पीते ही सुस्ती और नींद आने लगती है। नौकर ने झट से पलटी मारते हुए कहा कि जनाब यह तो आप ने लाख टक्के की बात कह दी। वैसे भी जिस बर्तन में लस्सी बनाई जायें, कई दिन तो उसकी चिकनाहट खत्म नही होती और न ही उसमें से बदबू जाती है। आप चाय और लस्सी का चक्कर छोड़िये, मैं आपके लिये खाना तैयार करता  हूँ।
नौकर की चापलूसी को भांपते हुए उन्होने कहा कि खाने में क्या खास खिलाओगे? नौकर ने कहा जी मेरी क्या औकात है कि मैं आपको कुछ बता सकूं? आप जो भी हुक्म करो मैं तैयार कर देता  हूँ। मिश्रा जी ने कहा बहुत दिन से भिंडी नही खाई। आज यदि कड़क तन्दुरी रोटी के साथ मसालेदार भिंड़ी बन जाये तो मजा ही आ जाये। नौकर ने मिश्रा जी की हां में हां मिलाते हुए कहा, कि आपने तो आज मेरे मुंह की बात छीन ली। मेरी भी बहुत दिनों से भिंड़ी पकाने का मन कर रहा था। कोमल-कोमल भिंडीयों के स्वाद का तो कोई मुकाबला ही नही। पास बैठे नेता जी ने कह दिया भिंड़ी बनती तो जरूर अच्छी है, लेकिन यह थोड़ी लेसदार होती है। नौकर ने नेता जी को खुश करने के इरादे से कहना शुरू किया कि आप बिल्कुल ठीक फरमा रहे हो, वैसे भी मंड़ी में सब्जीयों की कोई कमी थोडे ही है। भिंड़ीयों से तो अच्छा है कि आदमी सफेदी में मिलाने वाली गोंद खा ले।
मिश्रा जी ने नेता जी से कहा यदि आप हुक्म करे तो करेले की सब्जी तैयार करवा दूँ। इससे पहले नेता जी अपनी इच्छा जाहिर करते नौकर ने अपनी बकबक जारी रखते हुए कहा कि करेलों से बढ़ कर तो कोई दूसरी सब्जी हो ही नही सकती। भुने हुए प्याज और बढ़िया मसाले डाल कर करेले बने हो तो उसके सामने चिक्न भी फीका लगने लगता है। अब नेता जी ने नौकर को रोकते हुए कहा कि यह सब कुछ तो ठीक है लेकिन करेले थोड़े कडुवे होते है। मिश्रा जी के नौकर ने बिना एक पल सोचे समझे कहा कि यह तो आप बिल्कुल सच कह रहे हो। मुझे तो खुद यह नीम का बड़ा भाई लगता है। एक बार करेले की सब्जी खा लो, सारा दिन प्यास ही नही बुझती। करेले की सब्जी खाने से तो अच्छा है कि आदमी कुनैन की गोलीयां खा ले।
कुछ लोग जीवन में अपनी मंजिल पाने के लिये मेहनत को छोड़ सिर्फ झूठी तारीफ और चापलूसी का साहरा लेते है। चंम्चागिरी और चापलूसी के यह किस्से मिश्रा जी के नौकर या आम आदमी तक ही सीमित नही होते। चंद दिनों पहले जब महाराष्ट्र के एक मंत्री ने राहुल गांधी के जूते उठाये तो किसी को अंचभा नही हुआ क्योंकि ऐसा पहली बार नही हुआ था। बरसों पहले ज्ञानी जैल सिंह ने मैंडम इंदिरा गांधी के सैंड़िल उठाए थे। लोग उस हंगामे को आज भी याद करते है जब तरक्की पाने के लिए एक बार एन,डी, तिवारी ने संजय गांधी की चप्पलें उठाई थी। एक जरूरतमंद को तो अपनी मजबूरी के चलते भगवान को छोड़ बाहुबलीयों की चापलूसी करनी पड़ती है, परन्तु आज दुनियां में शंहशाह की हस्ती रखने वाले अभिताभ बच्चन भी अपना मतलब निकालने के लिए कभी नेहरू-गांधी की काग्रेंस के आंगन में, कभी छोटे भैया अमर सिंह के गले में बाहें डाल कर झूमते नजर आते है। आजकल तो खबर गर्म है कि अरबों रूप्यों के मालिक अभिताभ बच्चन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लुभा रहे है। फिल्मों में एैक्टिंग के माहिर असल जीवन में भी इतने बढ़िया एक्टर है कि मौके की नजाकत को देखते ही असानी से परिस्थितियों के मुताबिक रंग बदल लेते है। ऐसे लोगो का शायद यही मानना है कि जो काम चापलूसी से असानी से हो जाता है, उसे तो शायद भगवान भी न कर पायें।
हम सभी जानते है कि किस्मत किसी के हाथ में नही होती, लेकिन हमें यह नही भूलना चहिये कि मेहनत तो हमारे हाथ में है और मेहनत से हर कोई अपनी किस्मत बदल सकता है। इसीलिए हमें अपनी किसम्त पर नही सदा अपनी मेहनत पर विष्वास रखना चहिये। इस सच्चाई को कैसे झुठलाया जा सकता है कि योग्यता, ईमानदारी और धैर्यशीलता के समक्ष हर कोई घुटने टेकने पर मजबूर हो जाता है। जो व्यक्ति परिश्रम से डरता है वह जीवन में कभी भी सफल नही पा सकता। जौली अंकल दुनियां के सभी रंगो को देखने-परखने के बाद इतना ही समझ सके है कि चापलूसी करने वाले चाहे इसकी महिमा का कितना ही गुणगान क्यूं न कर ले, लेकिन हमें सदा झूठी तारीफ और प्रशंसा से बचना चहिये क्योंकि ये दोनो ही इंसान के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

2 comments:

sukhpreet singh said...

Really very nice message from that article.
thanks

Preett (Goldy)

Udan Tashtari said...

अच्छी सीख...