JOLLY UNCLE's hindi quotes & books

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Tuesday, April 13, 2010

कसक कलम की

मिश्रा जी की कलम से तराशी पहली चंद पुस्तकों की भारी सफलता और मुनाफे के मद्दे्नजर जैसे ही प्रकाशक महोदय को उनकी नई पुस्तक के बारे मे मालूम हुआ तो वो अपने सभी जरूरी कामों को भूलकर मिश्रा जी के घर के चक्कर लगाने लगे। किसी न किसी बहाने कभी थोड़ी बहुत मिठाई एवं फल लेकर यह महाशय उनके घर जा धमकते। यह दौर तब तक जारी रहा जब तक मिश्रा जी ने अपनी नई पुस्तक को छापने की अनुमति और पांडुलिपि प्रकाशक को नही थमा दी। एक अच्छे शिकारी की तरह प्रकाशक अच्छी तरह से समझता था कि पाठकगण इस महान लेखक की कलम से निकले हुऐ हर मोती की मुंह मांगी कीमत खुशी-खुशी चुका सकते है। जैसे ही प्रकाशक महाशय को मालूम हुआ कि जल्द ही विश्व पुस्तक मेला शुरू हो रहा है तो इन्होने मिश्रा जी की नई पुस्तक को जल्द से जल्द छपवाने के लिए दिन-रात एक कर डाला। सहित्य के कद्रदान से अधिक एक व्यापारी होने के नाते इस पुस्तक मेले में अधिक से अधिक बिक्री करने का मौका यह अपने हाथ से नही खोना चाहते थे। एक और जहां जल्द ही इस नई पुस्तक के बड़े-बड़े बोर्ड सारे शहर की शोभा बढ़ा रहे थे वहीं दूसरी और समाचार पत्रों में शिक्षा मंत्री द्वारा पुस्तक के विमोचन के समाचार भी धडल्ले से छपने लगे। बाकी सारी जनता को न्योता भेजने के बाद प्रकाशक साहब को इस महशूर परंतु सीधे-साधे लेखक की भी याद आ ही गई। अपनी पुस्तक के विमोचन का समाचार पाते ही मिश्रा जी की खुशी सातवें आसमान को छूने लगी। बधाई देने आऐ हुए मित्रगणों के सामने मिश्रा जी छोटे बच्चो की तरह इतरा रहे थे। यह सब कुछ देख उनकी पत्नी को मेहमानों को चाय-पानी पिलाना भारी लग रहा था। पहले से ही बुरी तरह से तंगी के कारण बिलबिलाते मिश्रा जी के परिवार को बिजलीपानी और दूसरे जरूरी बिल तिलमिलाने को मजबूर कर रहे है। इंतजार की घड़ियां जल्दी ही खत्म होकर पुस्तक विमोचन का दिन आ गया। मिश्रा जी सुबह से ही अपने सफेद बालों में खिजाब लगा कर और शादी के मौके पर पहनी हुई शेरवानी पहन कर मेले में जाने के लिये तैयार हो गये। जब जूते पहनने की बारी आई तो बरसों पुराने जूतो ने इस मौके पर मिश्रा जी का साथ निभाने से इंकार कर दिया। न चाहते हुए भी इतने बड़े लेखक को अपने पड़ोसी से जूते मांगने पड़े। सुबह से घंटो राह देखने पर भी जब प्रकाशक महोदय की गाड़ी इन्हें लेने नही आई तो इन्होनें खुद ही आटो रिक्शा से जाने का मन बना लिया। परंतु जब जेब में हाथ डाला तो लक्ष्मी देवी का दूर-दूर तक कोई पता नही था। किसी तरह हिम्मत जुटा कर लेखक महोदय ने अपनी बीवी से चंद रूप्यों की फरमाईश कर डाली। पत्नी ने तपाक् से कह दिया कि मुन्नी कल से बुखार में तप रही हैअब यदि यह पैसे भी आप ले जाओंगे तो उसकी दवा कैसे ला पाऊगीमिश्रा जी ने उसे तस्सली देते हुए कहा कि तुम किसी तरह आज ठंडे पानी की पट्टीया लगा कर काम चला लो। भगवान ने चाहा तो इस पुस्तक के बाजार में आते ही सारे दुख दर्द दूर हो जायेगे। जनसाधारण से लेकर नेता तक सभी यही उम्मीद करते है कि देश में फिर से यदि प्यारभाईचारा व शांति कायम करनी है तो यह काम केवल कलम के माध्यम से ही किया जा सकता है। इतिहास साक्षी है कि समाज में सभी जरूरी बदलाव लेखक की बदोलत ही मुमकिन हुए है। ऐसे में हम सभी इस बात को क्यूं भूल जाते है कि जो लेखक अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ नही कर सकता। जिसका अपना जीवन अंधकार में है वो समाज को किस प्रकार रोशनी की राह पर ला सकता हैजब कभी भी हिंन्दी लेखक की कोई पुस्तक प्रकाशित होती है तो चंद समाचार पत्रों में अपनी दो-चार फोटो देख कर ही उसकी बांछे खिल जाती है। हिंन्दी का आम लेखक तो कभी किसी उत्सव में फूल माला पहनकरकभी कोई छोटा-मोटा सम्मान पाकर ही खुद को महान समझने लगता है। इसका एक मात्र कारण यही समझ आता है कि आमतौर पर कोई भी हिंन्दी लेखक को भाव नही देता। कहने वालों ने तो तुलसीदास जी तक को कह दिया था कि क्या दो कोड़ी का लिखते होदूसरे देशो की बात को यदि छोड़ भी दे तो अपने ही देश में हिन्दी बोलने वालो को हीन भावना से देखा जाता है। हिन्दी लेखक को अपनी कलम से कले हुए अल्फाजों को पाठको तक पहुंचाने के लिए अपने स्वाभिमान तक को तिलांजलि देकर संपादको और इस धंधे से जुड़े व्यापारीयों की चापलूसी करनी पड़ती है।                        
लेखक तो उस वृक्ष की तरह है तो अपना सब कुछ केवल दूसरों को देना जानता है। जब कभी किसी वृक्ष की उंम्र पूरी हो जाती है तो भी वो ढेरों लकड़ी हमें दे जाता है। लेकिन यह सब कुछ तभी मुमकिन हो पाता है जब हम उस वृक्ष की ठीक से देख भाल करे। हमारे यहां लेखकों को अक्सर बड़े-बड़े समारोहों में अनमोल रत्न और न जानें कैसी बड़ी उपाधियों से नवाजा जाता है। लेकिन चंद दिन बाद किसी को लेखक की सुध लेने का ध्यान तक नही रहता। प्रकाशक और संपादक वर्ग लेखक की भावनाओं का जमकर दुरूप्योग करते हुए उन्हें अंधकार की और धकेल रहे है। हर समाचार पत्र और पत्रिकाऐं विज्ञापनों के माध्यम से लाखों रूप्यें कमा रहे है। ऐसे में क्या हमारे इतने बड़े लोकतंत्र में लेखको के हितो की सुरक्षा के लिये कोई व्यवस्था नही हो सकतीइस बात को असानी से समझा जा सकता है कि कुदरत के बाद यदि कोई बड़ा विश्वविद्यालय है तो वो है हमारे समाज का लेखक। मूर्ख आदमी तो ज्ञान का एक ही अंग देखता है और लेखक ज्ञान के सौ अंगो को देखता है। इसी से वो समाज को आत्मनिर्भर बनाने का काम कर सकता है। जौली अंकल भी एक लेखक होने के नाते कलम की कसक को समझते हुए इतना ही लिखना चाहते है कि असली ज्ञान वही हैजो अपने ज्ञान से दूसरों को लाभन्वित करें। 

1 comment:

Aman said...

Most interesting and entertaining articles. Congrats to Jolly Uncle.