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बुधवार, 18 नवंबर 2009

मन की भावना

एक बार दो दोस्त मंन्दिर में गये और दोनो ने भगवान से एक-एक वरदान मांगा। पहले दोस्त ने कहा कि भगवान मुझे दुनियॉ का सबसे खूबसूरत इंन्सान बना दो। दूसरे दोस्त ने देखा कि उसका दोस्त तो सच में बहुत ही सुन्दर बन गया है, उसने भगवान से अपने लिये वरदान मांगा कि मेरे इस दोस्त को पहले जैसा ही बदसूरत बना दो। अक्सर आपने आटो रिक्शा या किसी न किसी ट्र्रक के पीछे यह लिखा हुआ जरूर पढ़ा होगा कि आजकल लोग अपने दुखो से कम और दूसरे के सुखो से अधिक परेशान है। अब आप सोचेगे कि कुछ लोगो की इस प्रकार की घटिया सोच का कारण क्या हो सकता है? इसी के साथ यह बात भी साबित हो जाती है कि यह जरूरी नही की सारा ज्ञान हमें केवल अच्छी पुस्तको से ही मिल सकता है, हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से भी बहुत कुछ सीख सकते है। अक्कलमंद लोग इसीलिये अपनी आखें और कान सदा खुले रखते है कि न जाने ज्ञान की किरण कब और कहां से मिल जाए। थोड़ा गौर करे तो यही समझ आता है कि यह सब कुछ इंन्सान के मन की भावना के ऊपर निर्भर करता है। इसी कारण से शायद आज हम भगवान ध्दारा दिए हुए हर प्रकार के अनमोल सुखो को भुला कर भी दुखी रहते है। ऐसा करते समय हम यह भी भूल जाते है कि जो दूसरों के लिए गव खोदता है वह खुद ही एक दिन उसमें गिर जाता है।
मन की भावना से जुड़ा हुआ एक बहुत सी रोचक किस्सा आपको बताता  हूँ। कुछ अरसा पहले शहर के बहुत ही प्रसिद्द जाने-माने दानी सेठ जी मंदिर गये, तो वहां पूजा शुरू करते ही उनकी तबीयत बुरी तरह से खराब हो गई। जल्द से उन्हे अस्पताल ले जाकर उपचार करवाया गया। कुछ दिन बीतने के बाद जब सेठ जी बिल्कुल तन्दरुस्त हो गये तो उन्होने फिर से मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करने की इच्छा जताई। लेकिन सभी घर वालो को हैरानगी उस समय हुई जब सेठ जी की तबीयत फिर से पहले की तरह ही बिगड़ने लगी। सब लोग एक ही बात कह रहे थे कि मंदिर में जाते ही हर किसी के मन को शांति मिलती है, लेकिन सेठ जी के साथ ऐसा न जानें क्यूं हो रहा है? उनके घर वाले भी इस बात से काफी चिंतित हो गए कि आखिर मंदिर में ऐसा क्या है, जो सेठ जी वहां जाते ही बुरी तरह से बीमार हो जाते है? देश के अनेको विशेषज्ञ डॉक्टर और हकीम कुछ भी कर पाने में अपनी असमर्था जाहिर कर रहे थे। कई जादू-टोना करने वाले और तांत्रिंको का भी सहारा लिया गया, लेकिन कहीं से भी न तो कुछ उन्मीद की किरण नजर आ रही थी न ही इस सम्सयां का कोई हल मिल पा रहा था।
एक दिन अचानक संत स्वभाव के एक साधू सेठ जी के घर पर भिक्षा लेने के लिये आए। घर के लोगो को गहरी चिंन्ता में डूबा देख उन्होने परेशानी का कारण जानना चाहा। सेठ जी के बेटे ने साधू के चेहरे पर चमकते नूर से प्रभावित होकर उन्हें भारी मन से अपनी पिता की दुखभरी सारी व्यथा सुना दी। साधू महाराज ने कुछ पल ध्यान लगा कर इस परेशानी की गहराई को नापने की कोशिश की। कुछ देर बाद उस साधू ने ंबिल्कुल अकेले में उस मंदिर के पडिंत से मिलने की इच्छा जताई। कुछ ही देर में घरवालों ने दोनो की मुलाकात करवा दी गई। घर के सभी सदस्य साधू के इस व्यवहार को बहुत ही अजीब सा मान रहे थे। मंदिर के पंडित जी से बात करने के बाद साधू महाराज ने घरवालो को बताया कि समस्या का हल तो मिल गया है, लेकिन आप यह वादा करो कि आप मदिंर के पंडित जी से इस बारे में कोई जिक्र नही करेगे। मेरा यह दावा है, कि अब आपके पिता चाहे मंदिर या कही भी और जाये उनको कोई तकलीफ नही होगी।
सेठ जी के परिवार वालो के बार-बार अग्राह करने पर उस साधू ने उन्हें बताया कि जब कुछ अरसा पहले आपकी माता जी का देहान्त हुआ था तो आपने मंदिर में धर्म कर्म के कार्यो के इलावा पंडित जी और उनके बच्चो के लिये बहुत सारी धन-दोलत और कीमती समान दान में दिया था। बस उसी दिन से आपके पंडित जी के मन में लालच के कारण यह बात घर कर गई कि जिस दिन सेठ जी की मौत होगी उस दिन तो पहले से भी बहुत अधिक मोटी कमाई होगी। सेठ जी को देखते ही उस पंडित के मन में उनकी मौत की भावना का विचार जाग उठता हैं। आपके यह चहेते पंडित हर दिन बड़ी ही बेसब्री से आपके पिता की मौत का इंन्तजार कर रहे है।
पंडित जी से उनके मन की सारी बात सुनने के बाद मैने उनको यह समझाने का प्रयास किया है कि लालच की लालसा रखने वाले को जीवन में कभी सुख नही मिलता। बार-बार हाथ फैलाने वाला सारा जीवन दीन बन कर रह जाता हैं। समय से पहले और मुक्द्दर से अधिक कभी किसी को कुछ नही मिला है और न ही कोई दे सकता है। जो कुछ तुम्हारे भाग्य में है, उसे दुनियॉ की कोई ताकत तुम से छीन नही सकती और जिस चीज पर तुम्हारा कोई हक नही है, वो लाख चाहने पर भी तुम्हें प्राप्त नही हो सकती। मैं उम्मीद करता  हूँ कि मेरी यह सारी बाते आपके पंडित जी को बहुत अच्छी तरह से समझ आ गई है। अब पंडित जी के मन की भावना बिल्कुल साफ और पवित्र हो गई है, और उन्होने आपके पिता के प्रति अपनी हीन भावना के लिये आप सभी से क्षमा याजना भी की है।
जौली अंकल के मन की भावना तो यही कहती है कि अपनी जरूरत के लिए धन कमाना अच्छी बात है, किंतु धन-दौलत जमा करने की भूख को कोई भी ठीक नही मानता। वैसे भी दुनियॉ की सबसे बड़ी अमीरी धन नहीं है बल्कि परित्याग हे। इसीलिये आप सदा अपने मन में सदैव उच्च कोटि के विचारो को ही स्थान दे, इसी से आपको हर प्रकार के सुख मिलेगे और आपके मन की भावना पवित्र रहेगी।  

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