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Wednesday, November 18, 2009

नजरियां

एक बार दो कुत्ते बैठे आपस में बात कर रहे थे। पहले कुत्ते ने कहा कि मुझे लगता है कि हमारे मालिक हमारे लिए भगवान का दूसरा रूप है। दूसरे कुत्ते ने हैरान होते हुए कहा, आज तू कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहा है? यह अचानक तुझे ऐसा क्यों लगने लगा? पहले वाले ने बड़ी ही नम्रंता से जवाब दिया कि हमारे मालिक सुबह-शाम हमें अच्छा खाना देते है, हमें सैर करवाने के लिए सुंदर से पार्क में लेकर जाते है। जब कभी हम बीमार हो जाते है, तो हमारा अच्छे तरीके से इलाज करवाते है। दूसरे कुत्ते ने उसकी बात को बीच में ही काटते हुए कहा, यह लोग हमारे लिए यह सब कुछ इस लिए करते है, क्योंकि हम इनके भगवान है। पहले कुत्ते ने मायूस होते हुए कहा भैया यह तो अपनी-अपनी समझ और नजरिये की बात है।
ऐसा ही कुछ नजरियां है हमारे देश की सशक्त नेता मेनका गांधी का। उन्हें देश के हर जानवर की ंचिंता तो दिन रात सताती रहती है। यह अच्छी बात है कि वो किसी भी जानवरों के दुख दर्द को समझते हुए उन्हें कभी भी दुखी नही देख सकती। लेकिन इसे किस प्रकार की इंसानयित कहेगे कि इंसानों को तड़पता छोड़ उन्हें सिर्फ जानवरों पर ही तरस क्यों आता है? आजकल तो र्प्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा अन्य जानवरों के साथ गिद्वो को बचाने की मुहिम भी शुरू की गई है। उनका मानना है कि गिद्व मुद्र्वा जानवरों को खाकर र्प्यावरण को स्वच्छ बनाते है। सरकार को उनकी प्रजति के लुप्त होने की ंचिंता भी अभी से सताने लगी है। गिद्वों के घोंसलों तथा उनके प्राकृतिक वास की सुरक्षा भी सरकार सुनिश्चित करने में कोई कोर कसर नही छोड़ रही। इसी तरह के मुद्वे उछाल कर अन्य कई पार्टीयां भी अपनी चुनावी रोटीयां सेकने लगते है।
दूर-दराज की बात तो छोड़ो महानगरो में ही अनेको ऐसे हादसे हो चुके है कि कुछ मांसाहारी कुत्ते बच्चो को नोच-नोच कर मार डालते है। छोटे बच्चों के साथ कई बार बड़े बर्जुग को भी गाय, भैंस, बैल और अन्य बेलगाम जानवर लहुलुहान कर देते है। ऐसे हमलों में घायल हुए अनेक लोगो को अपनी जान से हाथ तक धोना पड़ता है। कुछ बदनसीब इस तरह की चोट लगने के कारण उंम्र भर के लिए विकलांगों वाला जीवन व्यतीत जीने को मजबूर हो जाते है। यह सच्चाई किसी से छिपी हुई नही है कि जब कभी किसी अमीर आदमी के साथ कोई हादसा होता है तो सभी विभागो की सरकारी मशीनरी एक दम से हरकत में आ जाती है। इसके उलट जब किसी कमजोर या गरीब आदमी पर कोई मसुीबत आती है तो उसकी मदद के लिये कोई एक भी हाथ आगे नही आता।
देश की राजधानी दिल्ली की सड़को पर मौत बरपाती ब्लू लाईन बसें बरसों से सैंकड़ो घरों के चिराग बुझा कर अभी भी लगातार कहर ढा रही है। परिवार के लिये रोजी रोटी की तलाश में सुबह घर से निकले लोग कई बार जीवन में कभी अपने घर नही लौट पाते। कभी कड़कती ठंड और कभी गर्मी से बेहाल होने के कारण हर साल हजारों लोग सड़क किनारे दम तोड़ देते है। दुर्घटना में घायल न जानें कितने ही लोग सिर्फ इस लिए भगवान को प्यारे हो जाते है क्योंकि उन्हें समय पर उपचार नही मिल पाता। घटना स्थलों पर सैकड़ो लोगों की भीड़ मे से कोई भी अक्सर जख्मी को बचाने के लिए पुलिस के डंडे के डर से आगे नही आ पाते।
यदि कोई हिम्मत करके घायल को अस्पताल तक पहुंचा भी देता है तो अस्पताल वाले इलाज शुरू करने से पहले उसकी जान की परवाह किये बिना पुलिस फाईल बनाने में घंटो का समय लगा देते है। आज जनसाधारण घायलों की मदद करने से इसलिए भी घबराता है क्योंकि उसके बाद बरसों तक पुलिस वाले उन्हें बार-बार थाने बुला कर परेशान करती है। कई मामलों में तो यहां तक देखने को मिला है, कि पुलिस वाले घायल व्यक्ति को अपने-अपने इलाके के कार्यक्षेत्र का झगड़ा बता कर घायल और लवारिस आदमी को मरने के लिए सड़क पर ही छोड़ देते है। ऐसे में सरकारी बाबू भी अपनी नौकरी को बचाए रखने के लिए मामले को रफा दफा करने में ही अपनी भलाई समझते है।
जानवरों से प्यार करना और उनकी देखभाल करना एक बहुत ही नेक और पुण्य का काम है। यदि इसी के साथ सरकार का थोड़ा सा प्यार-दुलार देश के गरीब और लाचार इंसानो को भी मिल जाए तो हर बरस हजारों-लाखों जाने बचाई जा सकती है। वैसे भी महापुरषो का मानना है कि नर सेवा नरायण सेवा होती है। इस मुद्दे पर जौली अंकल की आत्मा से तो यही आवाज निकलती है कि किसी घायल या जरूरतमंद की मदद ना करके अपनी राह पकड़ लेना भी किसी अपराध से कम नही होता। हम सभी का हर चीज को देखने का नजरियां अलग-अलग हो सकता है, परन्तु जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई जिसे हम भूलते जा रहे है वो तो यह है कि दूसरों से यदि आप अच्छा व्यवहार चाहते हैं तो फिर खुद्व भी अच्छा व्यवहार करना सीखिए।      

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