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Saturday, January 16, 2010

वसीयत

तेजी से बदलते विज्ञान के इस दौर ने आम आदमी के जीने का रंग-ढंग ही बदल दिया है। कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, चमचमाती तेज दौड़ती कारें जीवन का एक अभिन्न अंग बन गई हैं। महीनों का काम दिनों में और दिनों का काम कुछ घंटों और मिनटों में होने लगा है। आज एक सफाई कर्मचारी भी अपने मोबाइल फोन से दुनिया के किसी भी कोने में घर बैठे बात कर सकता है। हर प्रकार की सुख सुविधाओ होने के बावजूद भी हर इन्सान पहले से अधिक परेशान और दुखी रहने लगा है। हम अपने मन का चैन और शन्ति खोते जा रहे हैं। क्या हमने कभी इस बारे में विचार करने का प्रयास किया है कि आखिर ऐसा क्यूं हो रहा है?
कल तक जो जमीन-जायदाद कुछ हजारों रूपये की थी, वो आज लाखों और करोड़ाें की कीमत में पहुॅच गई हैं। जैसे-जैसे इन्सान के पास दौलत बढ़ रही है, उसकी मानसिकता या यूं कहें कि दिल छोटा होता जा रहा है। उसका धन-दौलत के प्रति लोभ बढ़ता जा रहा है। समाज कल्याण के बारे में तो सोचना तो दूर अपने मां-बाप की सेवा करने में भी परेशानी होने लगी है। बुजुर्गों को अपने ही घर में रहने के लिये कई बार कोर्ट कचहरी का सहारा लेना पड़ रहा है। आंकड़ें बताते है कि दुनिया के सबसे ताकतवर और अमीर देश अमरीका का हर दसवां नागरिक दिमागी तौर से परेशान है, जिनमें अधिकतर पागलपन की कतार पर है। ऐसा ही कुछ हाल यहां पर आत्महत्या करने वालों के ग्राफ का भी है।
हम हर अच्छे काम का श्रेय तो खुद लेना चाहते हैं और कुछ भी गलत होने पर सारा दोष भगवान के सिर मढ़ देते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हमारा मन हर अच्छे और बुरे काम का विश्लेषण करके किसी भी गलत काम को करने से पहले हमें चेतावनी देता है। लेकिन हम निषेधात्मक मत को जल्दी स्वीकार कर लेते हैं। और अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना कर देते हैं। आज की तेज दौड़ती जिंदगी में युवा-पीढ़ी को धर्म के बारे में बात करना समय की बरबादी लगता है। जबकि हमारे धर्मग्रन्थ हमें अनेक प्रकार के नशों से बचने, और रोगों से मुक्त अपना जीवन सुखमय तरीके से जीने की राह दिखाते हैं। हम लोग पुरखों से मिले उच्च संस्कारो को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना तो दूर खुद भी उन पर अमल करने में कठिनाई महसूस करते हैं।
हम अपने बच्चोें के सुख के लिये लाखों-करोड़ो रूपये इकट्ठा करते रहते हैं, ताकि उनको आने वाले समय में किसी प्रकार का कोई कष्ट न हो। लेकिन अगर उनका जीवन सचमुच सुखी बनाना है तो उन्हें जमीन जायदाद, पैसों के साथ पारिवारिक मूल्यों की पहचान करवानी होगी। उन्हें समझाना होगा कि साफ सुथरे आचरण के साथ जीने के लिये धर्म को सदा याद रखें। अपने स्वभाव में मीठा बोलने की आदत डालें, इससे आप किसी का भी मन जीत सकते हो। अपनी आंखें और कान हमेशा खुले रखें।
जहां तक हो सके निषेधात्मक बातों की और ध्यान न देकर केवल अपने वास्तविक, निर्णायक बातों को ही जीवन में उतारें। एक सभ्य नागरिक की तरह कानून की इज्जत करे। तरक्की की चकाचौंध में लोग चरित्र निर्माण का महत्व बिलकुल भूल चुके है। सुखमय जीवन जीने के लिये जिंदगी में जो कुछ भगवान ने हमें दिया है, उससे तृप्त और संतुष्ट रहने की बहुत महत्ता है। इसके बिना आप एक दिन भी शान्ति से नहीं जी सकते। जहां तक हो सके, फालतू बातों का बोझ न उठायें।
चरित्र निर्माण से ही जीवन मे असली सुख, शान्ति और समृध्दि आ सकती है। इससे पहले कि हम सब जिदंगी की भागम-भाग में भटकते हुए अन्धेरी राहों में खो जाएं, हमें अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करते हुए, उनको धन दौलत, जमीन जायदाद के साथ-साथ अपने पुरखों से मिले हुऐ उच्च संस्कारो और परिवारिक मूल्यों की वसीयत भी उनके नाम कर देनी चाहिये। जौली अंकल तो हर किसी को यही समझाने की कोशिश करते है कि सुख-चैन और शांतमय जीवन के लिए संतोष ही सबसे बड़ी दौलत है। एक शायर ने तो यहां तक कहा है कि :
कमा लो जितना कमा सकते हो, धन दौलत हीरे मोती,
पर एक बात याद रखना, कभी किसी कफन में जेब नहीं होती।     

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