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Saturday, March 13, 2010

मुर्दे का तोहफा


आज चाहे हमारे देश में दुनिया का एक से एक बढ़िया सामान बन रहा है, लेकिन न जाने अधिकतर लोगों के मन को अभी भी विदेशी चीजें क्यूं इतनी भाती है। कुछ लोग तो इन विदेशी चीजो के इतने दीवाने होते है, कि कोई भी परिवार का सदस्य या रिश्तेदार जब कभी भी विदेश से आ रहा हो, तो हर आदमी की सामान मंगवाने की एक लंबी चोड़ी लिस्ट तैयार रहती है। फिर चाहे वो भारत की बनी हुई ही वस्तु ही विदेश से क्यूं न खरीद कर ले आये? अगर कोई रिश्तेदार अचानक विदेश से आया है, तो हर आदमी को यह आस रहती है, कि विदेश से उनके लिये कुछ न कुछ तोहफा तो जरूर लेकर आया होगा।
अगर देखा जाए तो जीवन में तोहफे किसे अच्छे नहीं लगते? बच्चो से लेकर बर्जुगो तक को सदैव ही तोहफो का इंतजार रहता है। हर खुशी के मौके पर हम सब न सिर्फ दोस्तों-यारों को बल्कि रिश्तेदारों को अक्सर तोहफे देते और लेते रहते है। बच्चों को तो जन्मदिन के तोहफों का सारा साल इन्तजार रहता है। कुछ दिन पहले सुबह-सुबह हमारे हमारे वीरू साहब और उनके कुछ रिश्तेदार पंजाब से दिल्ली आये। पूछने पर उन्होंने बताया कि हमारी दादी जो छोटे भाई के पास कनाडा गई हुई थी, उनका वहीं देहान्त हो गया है। आज हवाई जहाज से उनका पार्थिव शरीर आ रहा है। हम सब उसी को लेने के लिये आये है। बर्जुगो के प्रति आदर और स्नेह देख कर बहुत अच्छा लगा कि इन सबको अपने बुजुर्गों से कितना प्यार है जो सब कामकाज छोड़कर पूरा परिवार पंजाब से यहां दिल्ली दादी के पार्थिव शरीर को लेने आये हैं।
हवाई अव्े पर कुछ कागजी कारवाई करने के बाद जब दादी के मृत शरीर का कफन घर लेकर आये तो सारा परिवार इक्ट्ठा हो गया। मुंह दिखाई के लिये कनाडा से आये मृत शरीर के कफन का जब ढक्कन खोलने की कोशिश शुरू की तो वो सब तरफ से बहुत ही मजबूती से पैक किया हुआ था। बक्से के किसी भी कोने में कोई जगह खाली नहीं छोड़ी गई थी। सबसे ऊपर एक चिठ्ठी रखी हुई थी, जिस पर वीरू भाई साहब का नाम लिखा था। उस चिठ्ठी का विषय कुछ इस प्रकार से था।
प्रिय वीरू भाई साहब एवं बंसन्ती भाभीजी को नमस्कार। दादी जी के अचानक गुजर जाने का बहुत ही अफसोस है। मैं दादी जी का मृत शरीर भेज रहा हूं। उनकी आखिरी इच्छा थी, कि उनका अन्तिम संस्कार पंजाब में उनके पैतृक गांव में ही किया जाये। मैं खुद भी इस मौके पर साथ आना चाहता था, लेकिन मेरी सारी छुट्टियां इनके इलाज में पहले ही खत्म हो गई हैं। अब सिर्फ तनख्वाह के बिना ही छुट्टी मिल सकती थी, वो मेरी बीवी ने लेने से मना कर दिया है।
दादी के कफन में उनके शरीर के नीचे बच्चों के लिये काफी सारी मंहगी वाली चाकलेट, वैफर और बिस्कुट रखे हैं। कुछ बादाम और काजू के पैकट भी दादी के दांये बाजू के नीचे छिपा कर रखे हुए हैं। दादी के पैरों में एक स्पोर्टस जूते डाले हुए हैं, वो निकाल कर बंटी को दे देना, उसने इसके लिये कई बार मुझे फोन किया था। दादी के पैरों में अलग-अलग रंग और डिजाइन की एक दर्जन जुराबें डाली हुई है, वो आप सब मिल कर बांट लेना। उम्मीद है, कि आपको डिजाईन और रंग पसन्द आयेंगे और साईज भी पूरा होगा।
हमने दादी को अलग-अलग डिजाईन की छह टी-शर्ट भी पहना दी थी, बड़ा साईज बंटी के लिये एवं छोटा बबली और चिंटू को दे देना। पिता जी के लिये एक मंहगी घड़ी भी दादी के दांये हाथ पर थोड़ा ऊपर बांधी है। उसे भी संभाल कर उतार लेना। बुआ जी और चाची के लिये सोने का बना हुआ एक-एक गले का हार और कुछ अंगूठियां भी दादी के गले और हाथों की अंगुलीयों में डाली हुई है। यह सब भी ठीक से उन्हें पहुंचा देना।
कफन के निचले हिस्से में कुछ गर्म सूट के कपड़े रखे है, वो आप सर्दियों में सिलवा लेना। भाई साहब आपके लिये मैंने दो बढ़िया वाली जीन्स भी दादी को पहना कर भेजी है। वो भी आप अंतिम संस्कार से पहले ठीक से उतरवा लेना। अगर इस सब के इलावा किसी और सामान की जरूरत हो तो जल्दी पत्र भेज देना, क्योंकि दादा जी की भी तबीयत ठीक नहीं रहती। मुझे नहीं लगता कि वो भी ज्यादा दिन नहीं चल पायेगे। बाकी का सारा सामान उनके कफन के साथ भेज दूंगा।
जौली अंकल तो सदा एक ही बात कहते है कि संतोष बड़ी से बड़ी दौलत से भी अच्छा होता है, खैर तोहफे तो आपने अपने जीवन में बहुत देखे होंगे, जौली अंकल का यह तौहफा आपको कैसा लगा?



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