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Saturday, March 13, 2010

एहसान सासू मां का


मजाक करने वाले खुश रहने के लिए हर किसी से हंसी ठिठोली कर लेते है। कुछ लोग तो भगवान के नाम से भी मजाक करने से नही चूकते। एक ऐसा ही मजाक कुछ दिन पहले पढ़ने को मिला कि भगवान राम को उनके पिता ने जब दुखी मन से वनवास जाने का आदेश दिया तो उस समय सीता माता भी अपना जरूरी सामान लेकर उनके साथ चल पड़ी। जब यह दोनों महल के सभी लोगो से विदाई ले रहे थे तो वहां खड़े लोगो ने सीता माता से पूछा कि आपको तो वनवास जाने का हुक्म नही मिला, फिर भी आप इनके साथ जंगल में रहने क्यों जा रही है? सीता माता ने मंद सा मुस्कराहते हुए कहा कि एक सास से तो निभाना मुश्किल होता है, यहां मैं अकेली, बिना पति के 3-3 सासू मां से कैसे निभा पाऊंगी? ऐसे में यहां महल में रहने से तो जंगल में रहना ही उचित होगा।
कहने वाले तो अक्सर कहते है कि औरत के चरित्र और आदमी के भाग्य को कोई नही समझ सकता, फिर सास तो आखिर सास होती है, उसके मन की गहराई को तो आज तक कोई इंसान तो क्या भगवान भी नही समझ पाऐं। यदि कोई गरीब अपनी बेटी को मंहगी कार, मोटरसाइकिल, धुलाई की मशीन, टी.वी. फ्रिज आदि नही दे पाता तो उस बदकिस्मत बहू को सारी उंम्र के लिए सासू मां के ताने सुनने पड़ते है। बेटा चाहे दो कोड़ी का भी न हो, लेकिन हर मां अपने बेटे के लिए उसके जन्म से ही चांद जैसी खूबसूरत बहू के सपने संजोने लगती है। सबसे सुंदर, सुशील कंन्या को दुनियां की हर मां अपनी बहू के रूप में देखना चाहती है। आजकल अधिकाश: परिवार तो ऐसी कामकाजी बहू पाना चाहते है जो घर की जिम्मेंदारी निभाने के साथ हर महीने दफतर से एक मोटी रकम का बंडल भी ला सके।
जो परिवार कामकाजी बहू नही लेते वो अक्सर उम्मीद करते है कि उनकी बहू चाहे कितनी भी पढ़ी लिखी क्यों न हो, घर के सभी सदस्यों के उठने से पहले सबकी पंसद का बढ़ियां सा नाश्ता तैयार रखे। नाश्ता निपटाते समय सभी की इच्छानुसार लंच के खाने की लिस्ट भी तैयार कर ले। शाम ढ़लते ही पति और ससुर के काम से लौटते ही गर्मा-गर्म चाय और पकोड़ो की थोड़ी सी देरी भी सासू मां का तापमान झट से बढ़ा देती है। चाय-पकोड़ो के बर्तन साफ करने के साथ ही लजीज डिनर की तैयारी करना भी ऐसी बहूओं की एक मजबूरी होती है। रोटी तरकारी बनाने मे जरा सी भूल होते ही बहू के सारे खानदान की कमियां निकालना और उसके मां-बाप को कोसने का तो सासू मां के पास जैसे जन्मसिद्व अधिकार हो। जमीन जयदाद, पति के करोबार और किसी प्रकार के आर्थिक मामलों में आज भी बहू को अपनी जुबान खोलने को कोई हक नही दिया जाता। ऐसे मसलों में बहू के बोलने का सीधा मतलब ससुराल वालो का अपमान माना जाता है।
बहू के माता पिता कितनी भी परेशानी में क्यों न हो, लेकिन यदि बहू ससुराल वालों को नजरअंदाज करके उनका पक्ष लेती है तो ऐसे में अक्सर सासूं मां के साथ दुल्हे राजा के बिगड़ने में पल भर की भी देरी नही लगती। बहू द्वारा मजाक में भी कही गई बात से भी ससुराल वालाें की शंति भंग होने का खतरा बना रहता है। बहू के मायके से हर दिन त्यौहार पर क्या-क्या और कितना कुछ आया है, इस बात पर भी सासू मां अपनी तीखे बाणो वाली टिंपणी देने का कोई मौका नही छोड़ती।
अधिकाश: ससुराल वाले आज भी बहू को एक पालतू जानवर की तरह घर के खूंटे से बंधकर रहने को ही अपनी मर्यादा समझते है। परिवार को आगे बढ़ाने के लिए ससुराल वालों की इच्छानुसार सहयोग करने के सिवाए बहू के पास कोई चारा नही होता। बहू को हर छोटी से छोटी खुशी परोसते समय सासू मां अपनी एहसान रूपी टांग उसके ऊपर रखना नही भूलती। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी उस बेचारी को हर समय यहीं सुनने को मिलता है कि तुम्हारी जैसी बहू को अपने परिवार में जगह देकर हम लोगों ने तुम्हारे सारे खानदान पर एहसान किया है।
ऐसी सासू मांओं को वैसे तो सदीयों से आज तक कोई नही समझा पाया लेकिन जौली अंकल फिर भी इतना जरूर कहना चाहते है कि हर सास को अधिकार है कि वो अपनी बहू के साथ जैसा चाहे व्यवहार करे, लेकिन एक बात पर जरूर गौर करे कि एक दिन वो भी किसी की बहू बन कर आई थी। एक पल के लिए अपने उस अतीत में झांकते ही उन्हें इस प्यारे से रिश्ते की सारी हकीकत समझ आ जायेगी। इसी के साथ उसे यह समझने में देर नही लगेगी कि कभी उसकी सास ने भी उस पर ऐसा ही एहसान किया था।

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