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Saturday, March 13, 2010

लकड़हारे की चतुराई


कभी-कभी जीवन में पुरानी बातों को याद करके बहुत आंनद मिलता है। आज आपको बचपन की यादों की गठरी में से एक बहुत पुरानी कहानी याद करवाता  हूँ, बचपन में हम सभी ने यह कहानी जरूर पढ़ी या सुनी होगी। एक बार एक गांव में एक लकड़हारा अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसके पास अपनी कोई जमीन-जयदाद नहीं थी, इसलिये वो सारा दिन पेड़ से लकड़ियां काट कर ही अपना और अपने परिवार का पेट भरता था। एक दिन वो लकड़हारा एक पेड़ से लकड़ियां काट रहा था, कि अचानक उसके हाथ से कुल्हाड़ी छूट कर पास बहती एक नदी में जा गिरी। उसने पेड़ से नीचे उतर कर नदी में से कुल्हाड़ी निकालने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस बेचारे को कोई सफलता नहीं मिली। लकड़हारे के पास कमाई का कोई दूसरा जरिया न होने की वजह से वो बहुत ही निराश होकर नदी के किनारे बैठ कर जार-जार रोने लगा।
भगवान जी यह सारा नजारा काफी देर से देख रहे थे। कुछ ही देर में ही उनका मन दया से पसीज गया, और उन्होंने तरस खाकर उस लकड़हारे की मदद करने का मन बना लिया। वो झट से उसके सामने प्रकट हुए और उसके दुखी होने का कारण विस्तार से जाना। उसका दुखड़ा सुनते ही भगवान जी नदी में गये, और एक चांदी की कुल्हाड़ी निकाल कर ले आये। लकड़हारे ने भगवान से कहा, महाराज यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है। मेरी कुल्हाड़ी तो बहुत ही पुरानी और वो भी लोहे की है। भगवान जी ने फिर नदी में डुबकी लगाई, और इस बार वो सोने की कुल्हाड़ी निकाल कर ले आये। लकड़हारे ने बड़ी ही नम्रतापूर्वक इस कुल्हाड़ी को भी लेने से मना कर दिया और भगवान से अपनी लोहे की कुल्हाड़ी ही ढूंढने की प्रार्थना की। भगवान जी ने तीसरी बार फिर नदी में डुबकी मारी और इस बार हीरे जवाहरातों से जड़ी एक बहुत ही बेशकीमती कुल्हाड़ी निकाल कर ले आये।
लकड़हारे ने हाथ जोड़ कर माफी मांगते हुऐ, इस कुल्हाड़ी को भी लेने से मना कर दिया। उसने फिर से अपनी लोहे की कुल्हाड़ी ढूंढने की प्रार्थना की। भगवान जी उसकी ईमानदारी से बहुत ही प्रसन्न हुए और उस लकड़हारे को उसकी लोहे वाली कुल्हाडी के साथ चांदी, सोने और हीरे-जवाहरातों से जड़ी सभी कुल्हाड़ियां उसको ईनाम में दे दी और साथ ही वादा किया कि जीवन में कभी भी कोई कष्ट हो तो वो उसकी सदा मदद करेंगे। वो खुशी-खुशी सारी कुल्हाड़ियां लेकर अपने घर चला गया और अपने परिवार के साथ सुखी-सुखी रहने लगा।
समय पाकर वो लकड़हारा एक बहुत ही धनवान आदमी बन गया। एक दिन वो अपनी पत्नी के साथ बाग में टहल रहा था कि अचानक उसकी पत्नी का पैर फिसला और वो कुएं में जा गिरी। उसने झट से अपने भगवान का ध्यान किया, और भगवान जी प्रकट हो गये। सारी व्यथा सुनने के बाद भगवान जी ने उसकी मदद करने के पहले उसकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया। वो कुएं में गये, और जाकर सबसे सुंदर हीरोईन मल्लिका शहरावत को निकाल कर ले आए। वो लकड़हारा तुंरत ही भगवान जी को धन्यवाद देकर वहां से जाने लगा।
भगवान जी ने उसे रोककर कहा पहले तो बहुत ईमानदार थे। आज एक सुन्दर और खूबसूरत औरत को देखते ही तुम्हारा मन बेईमान हो गया। उसने माफी मांगते हुए कहा, भगवन, ऐसी बात बिल्कुल नहीं है, मैं आज भी उतना ही ईमानदार  हूँ, जितना पहले था। लेकिन इस पहली औरत को स्वीकार करना मेरी मजबूरी है। भगवान जी ने पूछा कि अपनी पत्नी को छोड़ कर पराई औरत को स्वीकार करना तुम्हारी किस तरह तुम्हारी मजबूरी हो सकती है?
लकड़हारे ने बड़ी ही नम्रता से कहा अगर मैं इस औरत को स्वीकार नहीं करता, तो आप मेरी पत्नी को निकालने से पहले फिर से कुएं में जाकर विपाशा बासु और श्रीदेवी जैसी दो-तीन सुन्दर औरतें ले आते। मेरे बार-बार मना करने पर भी यदि आप खुश होकर कुल्हाड़ी की तरह सब औरतों को मेरे पास छोड़ जाते, तो मैं इन सभी को कैसे संभाल पाता? महाराज आजकल इस महंगाई के समय में एक औरत को पालना और संभालना ही बहुत मुश्किल काम है। ऐसे हालात में चार-चार सुन्दर औरतो को कैसे पाल सकता  हूँ? इस मजबूरी की वजह से ही मैंने पहली औरत को ही स्वीकार करने में ही भलाई समझी। उस लकड़हारे की चतुराई को समझते हुए भगवान के साथ-साथ जौली अंकल भी मुस्करा दिये। 


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