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Saturday, March 13, 2010

नामकरण

हर दिन सरकार और व्यापारी वर्ग मंहगाई को बढ़ाते हुए आम आदमी का जीना दूभर करते जा रहे है। आम आदमी की थाली से दाल-रोटी गायब होती जा रही है। बिजली-पानी के बढ़ते बिल एवं दाल-सब्जियों के आसमान छूते भावों के कारण औरतों को घर खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है। इस एक तरफ हम सब लोग बढ़ती महंगाई की मार से परेशान हो रहे है। हैं। दूसरी तरफ घर परिवार में कोई खुशी का मौका आते ही हम सबको महंगाई कुछ नहीं कहती। उस समय तो हमारा मकसद सिर्फ रिश्तेदाराें और बिरादरी वालों के सामने अपनी नाक को सबसे उंचा दिखाना ही होता है। इसके लिये चाहे हमारी बरसों की जमा पूंजी भी क्यूं ना लग जाए? जहां-जहां से भी कर्ज मिलने की आस होती है हम कोई मौका नहीं छोड़ते, बाद में इस कर्ज को चुकाने की कुछ भी कीमत अदा करनी पडे उसकी फिक्र किसे होती है?
ऐसा ही आजकल हमारे मुहल्ले में शर्मा जी के घर पर चल रहा है। उनके पोते के नामकरण की तैयारी तकरीबन एक-डेढ़ महीने पहले से शुरू हो गई थी। पूरे घर की रंगाई-पुताई का काम जोर-शोर से चल रहा है। घर के साथ-साथ गली की सड़क को भी ठीक कराने में शर्मा जी दिन रात दौड़धूप कर रहे हैं। पहली बार घर आने वाले रिश्तेदारों के सामने अपना रौब जताने के लिये आदमी क्या-क्या नहीं करता? यह सब तो हम अच्छी तरह से जानते हैं। नामकरण से पहले ही घर के सभी सदस्याें ने बच्चे का कोई ना कोई नाम सोच रखा है। और हर सदस्य यही चाहता है, कि पंडित जी उसी के सुझाये हुऐ नाम पर अन्तिम मोहर लगा दें। बच्चे के पिता जिन्होंने अपनी पत्नी और पिता को खुश करने के लिये इतना बड़ा प्रयोजन रचा है, परन्तु उनसे कोई नहीं पूछ रहा की उसके मन में क्या है? पिता को अपने बेटे के नाम से ज्यादा फिक्र रिश्तेदारों की आवभगत की है। गांव से पहली बार आनेवाले रिश्तेदारों को ठहराने की व्यवस्था भी अभी तो ठीक से नहीं हो पा रही है।
पंडित जी नामकरण करके कोई भी नाम बच्चे को दे दें, लेकिन बाद में कई बार बच्चे के नाम का मज़ाक बन जाता है। एक मां-बाप ने अपने बच्चे का नाम बड़े ही प्यार से नैनसुख रखा था, लेकिन एक हादसे में उस बेचारे की दोनों आखें चली गईं। एक फेरीवाला हमारी गली में सब्जी बेचने आता है, एक दिन बातचीत के दौरान उससे उसका नाम पूछा तो उसने अपना नाम रामभूल बताया। नाम सुनकर कुछ अजीब सा लगा। मैंने कहा हमने आज तक रामचन्द्र, रामलाल, रामप्रसाद, रामप्यारी आदि नाम तो सुने हैं लेकिन रामभूल नाम तो पहली बार सुन रहे है। उसने विस्तार से बताया कि मेरे पहले से ही सात भाई बहन थे, मेरे मॉ-बाप और बच्चा नहीं चाहते थे। लेकिन मैं फिर भी पैदा हो गया, तो मेरे माता पिता ने बिना किसी पंडित को पूछे ही मेरा नाम रामभूल रख दिया क्याेंकि मैं इस दुनिया में रामजी की भूल की वजह से ही आ पाया था।

शर्मा जी के घर मेहमानों का आना शुरू हो चुका था। एक दिन शाम को सब बच्चे गली में खेल रहे थे कि अचानक एक ऑटोरिक्शा आकर रूका और उसमें से एक बुजुर्ग की कड़कती आवाज आई ''ऐ छोरो इधर घासीराम का घर कहां है?'' सब बच्चे एक दूसरे के चेहरे की तरफ देखने लगे क्याेंकि किसी ने भी यह नाम पहले कभी नहीं सुना था। बच्चों के मना करने पर उस ताऊजी ने कुछ और लोगों से घासीराम के घर के बारे में पूछा तो सबने अपनी असमर्थता जाहिर की। ताऊजी ऑटोरिक्शा लेकर कालोनी में आगे बढ़ गये। काफी देर बाद ताऊजी थकेमांदे से फिर उसी ऑटोरिक्शा से गली में घासीराम का घर ढूंढते-ढूंढते आ पहुचें। इससे पहले कि वो किसी और से पूछते, सामने से मुहल्ले के प्रधान शर्मा जी आ गये। शर्मा जी को देखते ही ताऊजी की बांछें खिल गई। दूर से ही चिल्ला कर बोले डेढ़ घंटे से तेरा घर ढूंढ रहा हूं घासीराम।
तू तो कहता था कि दिल्ली शहर में तेरा बहुत रूतबा है यहां तो तुझे कोई पहचानता तक नहीं कम से 50 लोगों से तेरे घर के बारे में पूछ चुका हूं। शर्मा जी ने कहा क्या पूछा था आपने? ताऊ ने कहा, तेरे नाम से ही पूछ रहा था कि घासीराम का घर कहां है। शर्मा जी को यह सुनते ही जैसे तन बदन में आग सी लग गई। पूरी कालोनी मे उन्होंने अपने नाम को जी.आर. शर्मा (G.R. Sharma) के नाम से ही महषूर कर रखा था और ताऊ जी ने बरसों पुरानी मेहनत पर एक मिनट में पानी फेर दिया। शर्मा जी गुस्से में आगबबूला होते हुऐ बोले यह घासीराम क्या होता है? जी. आर. शर्मा कहते तो क्या तुम्हारी जुबान कट जाती। पूरी कालोनी में मेरे नाम की मिट्टी खराब कर दी।

इतनी दूर से आए मेहमानों की आवभगत तो दूर उनका स्वागत शर्मा जी ने गुस्से और गालियों से कर डाला। ताऊजी को कुछ देर तो बात ही समझ नहीं आई, कि आखिर यह सब हुआ क्या? जिस घासीराम को बचपन से उन्हाेंने अपनी गोद में खिलाया था, आज उसी को बचपन के नाम से बुलाने पर इतना बुरा क्यूं लग रहा है? खैर, पंडितजी तो जब पोते का नामकरण करेंगे वो तो तभी होगा। लेकिन शर्मा जी के गांव से आऐ सीधेसादे रिश्तेदारों ने शर्मा जी के नाम का बिना पूजापाठ के एक बार फिर से नामकरण कर डाला। वर्षों तक शर्मा जी जिस तख्ती पर बडे रौब से जी.आर. शर्मा लिखवाते रहे, उनके रिश्तेदारों ने उन्हें एक मिनट में फिर से उन्हें बरसों पुराना घासीराम बना दिया। जौली अंकल को ऐसे लोगो को देख बहुत दुख होता है, जो अपने बच्चो के बड़े-बडे नाम तो भगवान के नाम से जोड़ कर रख लेते है लेकिन उन्हे उस नाम की लाज बचाने के लिये अच्छें परिवारिक संस्कार देने में चूक कर जाते है। 

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