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Sunday, February 14, 2010

जंगल में चुनावी दंगल

सुबह-सुबह बंदर मामा ने देखा कि गधे मियॉ बहुत ही सज-धज के शहर की तरफ भाग रहे है। बंदर ने अपनी आदतनुसार उन्हे रोकते हुए कहा कि गधे मियॉ क्या बात आज बहुत चमक रहे हो। गधे ने बंदर को डांटते हुए कहा कि तुम्हारी यह बेवजह की रोक-टोक मुझे बिल्कुल पंसन्द नही है। लेकिन तुम भी ऐसे ढीठ हो कि लाख समझाने के बावजूद भी हर किसी को नेक काम करने से पहले हमेशा टोक ही देते हो। क्या तुम नही जानते की चुनावो का मौसम आ गया है। सरकार और नेताओ ने चुनावी बिगुल बजा दिया है। मैं भी अपना नामांकन पत्र भरने के लिये शहर जा रहा  हूँ। यह सुनते ही बंदर के साथ खड़े अन्य सभी जानवरो की हंसी छूट गई।
बंदर मामा ने अपनी हंसी रोकते हुए गधे से कहा कि तुम ने चुनाव लड़ने का मन तो बना लिया है। क्या तुम्हे चुनावों के बारे में क्या कुछ ज्ञान भी है? गधे मियॉ ने चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट लाते हुए कहा, कि इन्सानो की वो कहावत 'कि घर की मुर्गी दाल बराबर' हमारे जंगल में भी बिल्कुल खरी उतरती है। तुम लोग मेरी कद्र जानो या न जानो लेकिन शहर में तो मेरा बड़ा रूतबा है।
मेरे बिना शहर के लोगो का और खास तौर से नेताओ के बहुत से काम पूरे नही होते। नेता जी का धोबी उनके सारे मैले कपड़े मेरे ऊपर ही रख कर धुलवाने जाता है। उनका माली उनके बाग-बगीचे के लिये मिट्टी भी मेरे ऊपर ही ढोता है। उनके बच्चे सारा दिन मेरे साथ ही खेलते है। और मजे की बात तो यह है नेता जी की बेटी जब कभी कोई गलत काम करती है तो उसकी मां हमेशा यही कहती है कि मै तेरी शादी किसी गधे के साथ कर दूंगी।
बंदर मामा ने गधे से कहा कि तुम क्या जानो कि चुनाव जीतने के लिये नेताओ को क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते है? न तो तुम्हारी जुबान में कोई मिठास है और न ही ढंग से बात करने की तेजहीब। सबसे बड़ी मुशकिल यह भी है की तुम पढ़ना लिखना भी नही जानते। तुम मंत्री बनने का ख्वाब तो देख रहे हो, क्या तुम मंत्री पद का काम कर पाओगे? मंत्रीओ की हर बात में एक चमत्कार होता है, वो हर गुलशन में बेमौसम गुल खिलाने में माहिर होते है। उन को चाहे अपनी बात पर विश्वास हो या न हो लेकिन वो जनता को हर बार अपनी लच्छेदार बातों में उलझा कर बेवकूफ बनाने में कामयाब हो ही जाते है।
तुम तो किसी की बात सुनने से पहले ही हर किसी आने-जाने वाले को टांग मार देते हो। जबकि नेता बनने के लिये अपने विरोधी की टांग खीचने में महारत की जरूरत होती है। मुझे तो कुछ समझ नही आ रहा कि तुम्हें नेताओ के बारे में और क्या-क्या कहूं और क्या न कहूं। आखिर तुम्हारे साथ मथ्था-पच्ची करने से क्या फायदा? तुम यह सब क्या समझागे तुम्हे तो हर समय जानवरो की तरह बस चारा खाने की पड़ी रहती है। ऐसे में तुम्हे कौन चुनावो के लिए टिकट देगा?
गधे से अब और बर्दाशत नही हुआ, उसने बंदर का ललकारते हुए कहा कि नेता लोग तो जनता को आकर्षित करने के लिये तो ढोल-नगाड़ो का साहरा लेते है, मुझे तो उसकी भी जरूरत नही क्यूंकि मेरी तो अपनी ढेंचू-ढेंचू की आवाज ही बहुत दूर तक पहुंच जाती है। जहां तक पढ़ाई-लिखाई का सवाल है तो जरा मुझे यह बताओ कि हमारे कितने नेता पढ़े लिखे है। अब तुम कहते हो कि गधो को टिकट नही देते तो जरा मुझे यह समझाओ कि फिर हमारे इतने रिश्तेदार राजनीति में कैसे पहुंच गये?
बाकी रही काम काज करने की बात तो हमारे नेताओ को कौन सा काम करना आता है। तुम क्या समझते हो कि जनता सिर्फ टांग खीचनें वालो को ही वोट देती है? सारी दुनियॉ जानती है, कि टांग का इस्तेमाल हमारी बिरादरी से बढ़ियॉ कोई नही कर सकता? अब रही चारा खाने की बात तो क्या हमारे नेताओ के ऊपर जानवरो का चारा खाने के अनेक मामले अदालतो में नही चल रहे। इतना सब कुछ होने के बाद फिर भी हमारा देश राम भरोसे चल ही रहा है। हां अगर तुम्हे मेरी उंम्र कुछ अधिक लग रही है तो मैं किसी पार्टी के युवा खंण्ड का प्रधान बन जाऊगा।
इस लेख को लिखते समय जौली अंकल की मंशा किसी के मन को ठेस पहुंचाना नही, बल्कि चुनावी तनाव को कम करते हुए महौल को हल्का-फुल्का, और खुशनुमा बनाना है ताकि चुनावो के त्योहार का अधिक से अधिक आनंद लिया जा सके।  

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