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Wednesday, December 16, 2009

नन्हें फरिश्ते

मिश्रा जी ने अपने बेटे से कहा कि जरा बाहर देखना की बरसात हो रही है कि नही। बेटे ने इंटरनैट पर गेम खेलते-खेलते ही कह दिया कि अभी-अभी अपना कुत्ता हनी बाहर से ही आया है, आप जरा इसे हाथ लगा कर देख लो कि वो गीला है या सूखा, आपको पता लग जायेगा। कुछ देर बाद मिश्रा जी ने बेटे से कह दिया कि मुझे सुबह जल्दी उठना होता है, अब तुम अगर बत्ती बंद कर दो तो मैं आराम से सो सकूं। बेटे ने कहा यह तो मुमकिन नही है अभी तो मुझे कम्पूयटर पर अपनी गेम खेलनी है। आप अपनी आखें बंद कर लो, अपने आप अंधेरा हो जायेगा। आखिर में पिता ने फिर से कहा कि रात बहुत हो चुकी है, यदि और कुछ नही कर सकते तो कम से कम घर का दरवाजा तो बंद कर दो। हाजिर जवाब बेटे ने झट से कहा, पिता जी पहले के दोनों काम मैने कर दिये है, अब एक काम तो आप खुद भी कर लो।
बेहद तेजी से बदलती इस दुनियां में लोग भी तेजी से बदल रहे है। हालिंक इस सब के बीच एक बड़ा सवाल यह है कि क्या हम इस बदलाव के लिये मानसिक रूप से तैयार है। पहले जमाने के मुकाबले आजकल एक या दो बच्चे होने के कारण मां-बाप बच्चो की हर इच्छा पूरी करने में पल भर की भी देरी नही करते। हर लड़की एक नन्ही परी और लड़का मां-बाप के लिये एक नन्हें फरिश्ते से बढ़ कर होता है। सयुक्त परिवार तो अब गुजरे जमाने की बात होती जा रही है। आज की युवा पीढ़ी के पास इतना समय भी नही है कि वो दिन में एक बार सारे परिवार के साथ मिल-बैठ कर खाना भी खा सके।
आज के बच्चो को मां-बाप से हर प्रकार का खाना-पीना, सिकयुरिटी, एसी, टीवी, कम्पूयटर, कार-मोटर साईकल आदि लेने के हक तो याद रहते है, लेकिन मां-बांप, घर-परिवार और समाज के प्रति अपने किसीर् कत्तव्य को याद रखना वह जरूरी नही समझते। यहां हम सारा दोष बच्चो के सिर मढ़ कर खुद को पाक साफ नही कह सकते। बच्चा चाहे स्कूल या कालेज में पढ़ाई कर रहा हो, हमारा यह फर्ज बनता है कि हम समय-समय पर उनकी परफार्मेस रिपोर्ट चैक करते रहे। बच्चो के हर मिलने वाले और नजदीकी दोस्तो की पूरी जानकारी रखने का भी हमारा पूरा हक बनता है।
सारे दिन में चंद पलों के लिये ही सही, एक बार सारे परिवार के मिल बैठने से घर के हर सदस्य को अपनी बात एवं परेशानी रखने का मौका मिलता है। जो बच्चे किसी कारणवश घर के बड़े-बर्जुगो से डर कर दिल की बात नही कह पाते उनको भी खुलने का और कुछ करने का मौका मिलता है। किसी बच्चे में कितने भी गुण क्यूं न हो, अगर उसे अवसर ही न मिले तो बड़ी से बड़ी प्रतिभा और अच्छे से अच्छे गुण कभी निखर नही पाते। कोई भी पोधा जब तक छोटा और कोमल होता है, उसे आप अपनी इच्छा अनुसार सहारा देकर ढाल सकते है। लेकिन यदि किसी पेड़ का पोषण बिना किसी अधार से किया जाऐ तो वो बिल्कुल ढ़ेड़ी-मेढ़ी शक्ल अख्तियार कर लेता है। उस समय हम लाख कोशिश करने पर भी उसको ठीक नही कर सकते।
हर माता-पिता अपने जीवन के सभी अधूरे अरमान, आशाओं, चाह और हसरतो को अपने बच्चो के माध्यम से बिना उचित माहौल दिए हुए ही पूरा करना चाहते है। इस तेज रफतार जिंदगी में हर कोई चाहता है कि उनके नन्हें फरिशते की तूती पढ़ाई से लेकर खेल के मैदान तक हर क्षेत्र में बोले। हम यहां यह बात भूल जाते है, कि भगवान कभी भी सारे गुण एक व्यक्ति को नही देता। नतीजतन फूल जैसे कोमल बच्चो पर अनावश्यक दबाव बना कर अपने जीवन में परेशानीयों को न्यौता दे डालते है। इतना तो आप भी जानते होगे कि परेशानी कभी भी अकेले नही आती, एक परेशानी के साथ सैंकड़ो दुख खुद ब खुद हमारे जीवन में चले आते है।
आप बच्चो को प्यार से यह समझााने का प्रयास करे कि यदि जिंदगी के किसी क्षेत्र में कभी सफलता नही मिली तो निराश मत होइए, बल्कि प्रयास जारी रखिए। हर मनुष्य की असली परीक्षा विपति पड़ने पर ही होती है, जो धैर्य रखता है वह हर मुसीबत से पार पा जाता है। यदि छोटी-छोटी समस्याऐं आने पर आप घबरा जाएंगे, तो आपके दिमाग के साथ-साथ आपके नन्हें फरिश्तो का संतुलन भी बिगड़ सकता है।
जौली अंकल का तर्जुबा तो यही कहता है कि कभी भी किसी दूसरे की नकल करने से कद्र नही मिलती। जब कोई बहुत ही खूबसूरत तस्वीर बन कर तैयार हो जाती है, तो हर पारखी नजर उस तस्वीर के साथ उसको बनाने वाले कलाकार की तारीफ किये बिना नही रह सकती। आप भी अपने बच्चो को ऐसे अच्छे संस्कारों के सांचे में ढालें की हर जुबां से एक ही बात निकले कि यह बच्चे है या नन्हें फरिशते।    

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