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Wednesday, December 16, 2009

बच्चे बिगड़ते ही क्यों है?

एक बार दो कुत्ते आपस में बात कर रहे थे। पहले कुत्ते ने कहा कि मुझे ऐसा लगता कि हमारे मालिक हमारे लिये भगवान के बराबर है। दूसरे कुत्ते ने तपाक से कहा, कि क्या कह रहा है तू? अब पहले वाले कुत्तें ने उसे समझाना शुरू किया कि हमारे मालिक सुबह-शाम हमें अच्छा खाना देने के साथ हर समय हमारी सेवा और देखभाल करते है। जब कभी हम बीमार हो जाते तो हमें डॉक्टर के पास इलाज के लिए लेकर जाते है, तो यह सब क्या कम है? दूसरे कुत्ते ने कहा, बेवकूफ हमारे मालिक तो यह सब कुछ इसलिये करते है, क्योकि हम भगवान है।
हर चीज को परखने का नजरियां भी हम सब का अलग-अलग हो सकता है। बच्चे बिगड़ते ही क्यूं है, इस बारे में कई अलग-अलग मत हो सकते है। परन्तु हम सभी इस बात को नही झुठला सकते कि बगीचे में यदि कोई एक पोधा खराब हो जाता है, तो अच्छे फूलो की वाहवाही लूटने वाले माली को उस खराब पौधे की जिम्मेदारी भी लेनी पड़ती है।
जीवन में सच्चाई और संतोष को भूलकर आज की मार्डन पीढ़ी तेजी से बदल रहे समाज और दिलो-दिमाग पर फिल्मों की छाप से प्रभावित होकर मौज-मस्ती और दिखावे की जिंदगी को अधिक पंसद करने लगी है। वो यह भूल जाते है कि फिल्मों में सब कुछ दिखने वाला महौल तो केवल एक कल्पना मात्र होता है और यह सब कुछ असल जिंदगी में पाना मुमकिन नही हो सकता। दोस्तों में सदा अपनी नाक ऊंची रखने की इच्छा, सीमित स्रोतो एवं आर्थिक मंदी के चलते हीरो-हीरोईन के शाही स्टाईल को अपने जीवन में अपनाने की लालसा उन्हें शरीफ लोगो के साथ ठगी और हेराफेरी करने पर मजबूर कर देती है।
जिस प्रकार आजकल मीडियां वाले हर अपराधी को हीरो की तरह पेश करते है, उससे प्रभावित होकर चमचमाती कारे और हवा से बाते करती मोटर-साईकल पाने के लिये आज के युवा लूट, हत्या और शातिर अपराधीयों की तरह सनसनीखेज वारदातो को अंजाम तक दे डालते है। आम-आदमी बन कर जीना इन्हें एक गाली लगता है। आज अपने शाही खर्च को पूरा करने के लिये ही अधिकांश: युवा क्रिमिनल बन रहे है । तन और मन की खुशी पाने के लिये एक समय के बाद आज के बच्चे किसी को कुछ देने की बजाए दूसरो से उनका हक छीनने में अधिक विश्वास रखते है। इस तरह के दुशप्रभावों के कारण ही नई पीढ़ी बिना मेहनत किये ही जीवन का हर सुख पाना चाहती है।
हम लोग अक्सर अपनी भावनाओं का खुल कर इजहार करने की बजाए अपने प्यार की नुमाईश मंहगे खिलाने और कपड़े आदि लेकर करते है। जबकि बच्चो को यह बताना भी जरूरी है कि कोई कितना भी धनवान क्यूं न हो, बच्चो की हर मांग पूरी नही की जा सकती। यह जानते हुए भी कि अन्याय में सहयोग देना, अन्याय के बराबर है, हम बच्चो को खुश करने और समाज में अपने रूतबे को बनाए रखने के लिये उनकी हर जायज और नजायज मांग को पूरा करने के लिये बैंक से उनकी मनचाही शर्तो पर कर्ज उठा लेते है। फिर जब समय पर कर्ज की अदायगी नही हो पाती तो सारे परिवार के लिये परेशानीयां बढ़ने लगती है।
कुछ लोग जो इस प्रकार के झटके बर्दाशत नही कर पाते वो तो खुदकशी तक करने की सोचने लगते है। जरूरत इस बात की है कि हम बचपन से ही बच्चो के कोमल हृदय में अच्छे संस्कारों के साथ यह बात बिठाने की कोशिश करे कि संतोष बड़ी से बड़ी दौलत से भी अच्छा होता है। बच्चो को यदि हम यह समझा पाये कि कामयाबी का कभी कोई शॉटकर्ट नही होता, तो आने वाले समझदार बच्चे कभी भी किसी गलत राह पर नही चलेगे।
बच्चो के लिये यह भी जानना जरूरी है कि अच्छी और बुरी संगत का जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। इसलिये सदा ही बुरे लोगो से दूर रहते हुए अच्छे लोगो की संगत करना बेहतर रहता है। सच्चा इंसान वही है, जो बुराई का बदला भलाई से दे, और खुद को सदा गुनाह करने से बचाऐ। बच्चे को यदि यह मालूम हो जाये कि दूसरे का भला करते वक्त सदा मन में यकीन रखो की इसी के साथ तुम्हारा अपना भला भी हो रहा है, तो वो जीवन में आने वाली हर खुशी को अपने तक सीमित न रख कर दूसरों में भी अवश्य बांटेगे।
सब कुछ जानते हुए भी हम बच्चो की हर गलती को नजरअंदाज करने के लिये कई बार अपनी आंखें मूंद लेते है। बच्चो के प्रति अनजान और लापरवाह होने की बजाए हमें जीवन में उच्च आदर्श स्थापित करते हुए रोजाना कुछ वक्त परिवार के साथ जरूर गुजारना चाहिये। जिससे बच्चो को प्यार दुलार के साथ अच्छें संस्कार और बेहतर तरीके से जिंदगी जीने की कला सीखने में मदद मिलेगी। जौली अंकल का तो यह दावा है कि यदि बच्चो को अपने प्यार के रंग में रंगते हुए उनके हर अच्छे काम की तारीफ करे और समय-समय पर उनका हौंसला बढ़ाते रहे, तो कोई भी बच्चा कभी बिगड़ ही नही सकता।  

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