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Wednesday, December 16, 2009

साधू और शैतान

बरसों पुराने घर के सदस्यों की तरह रह रहे साधू काका ने वीरू की अपाहिज मां को जैसे ही खाना दिया तो उन्होनें उसे डांटते हुए कहा, कि अब तो तुम एक उंम्र से इस घर में काम कर रहे हो, क्या तुम्हें इतना भी नही पता कि डॉक्टरो ने मुझे घी-तेल वाला खाना खाने से मना किया हुआ है। मसखरी हंसी हंसते हुए उसने जवाब दिया कि मां जी माफ करना जल्दी-जल्दी में, मैं अपनी थाली आपको दे गया  हूँ।
साधू काका बचपन से इस घर की सेवा करते-करते अब इतना बड़ा हो चुका है कि चंद दिनों बाद ही उसकी बेटी की शादी होने वाली है। प्यार और सच्ची लगन से घर के हर काम को अच्छे से करने की बदौलत साधू काका घर के हर सदस्य का चहैता बन चुका है। घर में कोई भी खुशी का उत्सव हो या परेशानी के कोई पल साधू काका घर की हर जिम्मेंदारी को बखूबी निभाना जानता है। इन्ही सभी बातों के मद्देनजर उसकी ऐसी हरकतो पर गुस्सा करने की बजाए हर कोई हंस कर नजर अंदाज कर देता है।
आज जब वीरू दफतर से लौटा तो उसकी मां ने कहा कि बेटा साधू काका की बेटी की शादी को अब कुछ ही दिन शेष बचे है, मैने तुम्हें कई दिन से उसकी बेटी की शादी के लिये कुछ सामान लाने को कहा था। अगर ठीक समझो तो आज इस काम को निपटा डालों। वीरू ने मां से कहा कि इस समय अपनी बीमार और दिमागी तौर पर कमजोर बेटी गुनगुन के साथ बाजार जाकर कुछ भी काम ठीक से नही हो पायेगा। मां ने उसे समझाते हुए कहा कि तुम लोग गुनगुन को घर पर ही छोड़ जाओ मैं और साधू मिल कर उसे संभाल लेगे।
अब वीरू मां को मना नही कर सका और अपनी पत्नी के साथ साधू काका की बेटी की शादी के लिये जरूरी खरीददारी करने बाजार की और चल पड़े। छोटा-बड़ा शादी का सामान खरीदते हुए इन दोनो को बाजार में काफी समय लग गया। रात को घर लौटते हुए वीरू और उसकी पत्नी को बहुत देर हो गई। घर पहुंचने पर साधू काका ने ही दरवाजा खोला और पूछने पर उसने बताया कि मां जी और गुनगुन खाना खा कर सो गई है। खाना खाने से पहले वीरू ने खुशी-खुशी शादी का सारा सामान साधू काका को दे दिया।
सुबह जैसे ही वीरू की पत्नी गुनगुन को स्कूल भेजने के लिये उठाने गई तो मासूम और लाचार बच्ची के तन के कपड़े, बिस्तर और शरीर के दर्दनाक घाव एक बहुत ही खतरनाक कहानी ब्यां कर रहे थे। यह सब देखते ही उसकी जोर से चीखे निकल गई। यह सब कुछ देख वीरू झट से साधू काका के कमरे की और भागा लेकिन वो सारा कीमती सामान गहने, और कपड़ो के साथ वहां से नदारद हो चुका था। इस हादसे को देख घर के सभी सदस्य पागलों की तरह रो रहे थे।
वीरू की मां ने रोते-रोते कहा कि न जाने साधू काका ने हमारी फूल जैसी मासूम बच्ची के साथ यह कुकर्म करके किस जन्म का बदला लिया है। कोई इंसान गली के आवारा कुत्ते को भी कुछ दिन सूखी रोटी के चंद टुकड़े डाल दे, तो वो जानवर होते हुए भी अपने मालिक के साथ ऐसा घिनोना व्यवहार नही करता। जिस नौकर को घर के बच्चो की तरह पाल पौस कर इतना बड़ा किया आज उसे कुत्ता कहना भी कुत्ते को गाली देने जैसा होगा।
पुलिस के अफसर और वहां खड़े सभी लोग अपनी-अपनी बात कह रहे थे, लेकिन वीरू की मां ने सभी को समझाते हुए कहा कि इसमें दूसरों की दोषी ठहराने की बजाए मैं अपना दोष अधिक मानती  हूँ। हम सभी की यह कमजोरी है कि जब तक दूसरो के साथ कुछ भी होता रहे हम उसकी चिंता नही करते, जब कोई इस तरह की भयानक घटना हमारे साथ घट जाती है तो हम उस बारे में चिंता करनी शुरू करते है। आज समाज में हर कोई अच्छे संस्कारों को भूल कर केवल अच्छे से अच्छा घर और व्यापार चाहता है। हमें यह कभी नही भूलना चहिये कि जो दूसरों की मुसीबत में काम आता है, उस पर कभी मुसीबत नही आती।
बनाने वाले ने हम सभी को एक जैसा बनाया है। एक और हमारे अच्छे कर्म ही हमें आम आदमी से साधू-संत का दर्जा दिलवाते है, वही दूसरी और लोभ और वासना महान साधू-संत को एक पल में शैतान बना देती है। अपनी इन्द्रियों पर सम्पूर्ण नियंत्रण ही एक इंसान की सच्ची विजय होती है। काम ही हमारे जीवन का सबसे महाशत्रु है, इस पर जीत पाने से ही कोई जगतजीत बन सकता है। परिस्थितियां कैसी भी हो, हिम्मत ही मनुष्य का कठिन परिस्थितियों में साथ देती है।
जौली अंकल इस दुखदाई घड़ी में समाज के लिये केवल इतना ही संदेश देना चाहते है कि आज समाज, राष्ट्र व विश्व की सबसे जटिल समस्याओं का एकमात्र हल है चरित्र। चरित्र बिगड़ जाने पर साधू-संत भी अपनी प्रतिष्ठा खो कर पल भर में शैतान बन जाते है।  

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